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सोनिया के भोज में गैरमौजूद रहे नितीश

राष्ट्रपति चुनाव के लिए साझा उम्मीदवार खड़ा करने के लिए विपक्षी दलों की तरफ से मंथन जारी है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर बाकी दूसरे दलों के नेताओं से इस बाबत मुलाकात का सिलसिला जारी रखा है.
अब इसी कड़ी में दिल्ली में गैर-बीजेपी गैर एनडीए दलों की बैठक बुलाकर सोनिया गांधी ने विपक्षी एकता का संदेश देने की कोशिश की है. विपक्ष की कोशिश है कि राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए विपक्ष की तरफ से एक साझा उम्मीदवार खड़ा किया जाए.
नीतीश कुमार के शामिल नहीं होने पर उठे सवाल
विपक्षी एकता को बड़ा झटका उस वक्त लगा जब बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की तरफ से दिल्ली में होने वाले विपक्षी दलों की इस बैठक से खुद को अलग कर लिया गया.
इस बाबत कहा गया कि पहले से तय व्यस्त कार्यक्रम के कारण वो इस बैठक में शिरकत नहीं कर सकेंगे. हालांकि जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शरद यादव इस बैठक में जेडीयू की अगुआई करेंगे.
लेकिन, नीतीश कुमार के इस बैठक में शामिल नहीं होने के फैसले से विपक्षी एकता पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं. गौरतलब है कि सबसे पहले नीतीश कुमार ने ही राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर रणनीति बनाने के मकसद से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की थी.
इसके बाद सोनिया गांधी ने विपक्ष के कई नेताओं से अलग-अलग मुलाकात कर साझा उम्मीदवारी पर मंथन किया था. अब नीतीश की गैर-मौजूदगी के बाद सवाल उठ रहे हैं कि विपक्ष की बैठक का औचित्य कितना अहम रह जाता है.
मौजूदा हालात पर गौर करें तो विपक्षी दलों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ही साख और छवि सबसे साफ दिख रही है. बिहार में आरजेडी के साथ सत्ता चला रहे नीतीश कुमार अबतक अपनी बेदाग छवि को बरकरार रख पाए हैं. दूसरी तरफ, आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव अपनी पुरानी दागदार छवि से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं.
यूपी में भी विपक्ष की धार पड़ी है कुंद
नसीमुद्दीन ने मायावती पर उगाही से लेकर मुसलमानों के लिए अपशब्द कहने का आरोप लगाया
दूसरी तरफ यूपी में चुनावी हार के बाद अखिलेश यादव और मायावती की आक्रामकता की धार भी कुंद हुई है और उनकी हैसियत भी बीजेपी विरोधी धड़े में काफी कम हो गई है.
लेफ्ट का भी हाल बुरा ही है. हां पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बीजेपी विरोधी धड़े में काफी मजबूत दिख रही हैं. लेकिन, उनकी पार्टी के नेताओं के कई घोटालों में गिरफ्तारी और उनके फंसने के बाद से ही ममता बनर्जी की छवि उतनी साफ-सुथरी नहीं रह पाई है.
बीजेपी विरोधी दलों की तरफ से कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने है. लेकिन, कांग्रेस के भीतर वो करिश्माई नेतृत्व नहीं दिख रहा है जिसको केंद्र में रखकर विपक्षी दलों को एक सूत्र में बांधा जा सके.
बात घूम फिर कर सोनिया गांधी के ही इर्द-गिर्द आ जाती है और सोनिया एक बार फिर से राहुल की बजाए खुद ही राष्ट्रपति चुनाव के लिए मोर्चा संभाल चुकी हैं.
विपक्ष के सबसे मजबूत शख्स हैं नीतीश
ऐसे में मोदी विरोधी राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार ही एक ऐसे शख्स नजर आते हैं जिनके चेहरे को सामने रखकर सभी विरोधी दल विपक्षी रणनीति का ताना-बाना बुन सकते हैं.
अटकलें इस बात की लगाई जा रही थी कि पहले राष्ट्रपति चुनाव के वक्त विरोधी दलों को साथ लिया जाएगा. लेकिन, असल मकसद 2019 की लड़ाई के लिए मोदी विरोधी मोर्चा बनाने को लेकर है. अटकलें थी नीतीश कुमार इस मोर्चे में बड़े ध्रुव का काम कर सकते हैं.
लेकिन, पहले अपने-आप को प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की दौड़ से बाहर रखने का ऐलान और अब राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष की साझा बैठक से बाहर रहकर नीतीश ने इस पूरे विपक्षी ताने-बाने की हवा निकाल दी है.
Via FirstPost

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