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बड़ा खुलासा : जानवरों के ग्रीस से बनते हैं साबुन

आप हर दिन इसे अपने चेहरे और बॉडी पर लगाते हैं. लाखों रुपए इसकी खुशबू और शुद्धता का विज्ञापन करने में खर्च किए जाते हैं. आइए देखते हैं कि आपका साबुन कितना शुद्ध है.
क्या होते हैं एनिमल फैट्स?
प्रोफेशनल लैंग्वेज में एनिमल फैट दो तरह का होता हैः ऐसा फैट जो कि किडनी और अन्य अंगों से हासिल होता है. इसे किलिंग फैट्स कहा जाता है क्योंकि इसे जानवरों, भेड़ों, बकरियों और सुअरों की हत्या करते वक्त हासिल किया जाता है.
दूसरा फैट वह होता है जिसे जानवर के शव को रिटेलर को बेचा जाता है और तब उससे फैट निकाला जाता है. इसे कटिंग फैट्स कहा जाता है. इन्हें गर्म करने से ऑयल मिलता है. इसी ऑयल या ग्रीस का इस्तेमाल हम या तो अपने फूड में या कैंडल्स में या अपने चेहरे पर करते हैं. इसे टैलो कहा जाता है और इसमें मृत जानवरों के मीट जैसी दुर्गंध इसलिए नहीं आती है क्योंकि इसे उबालने के जरिए इसकी दुर्गंध को दूर कर दिया जाता है.
जानवरों के ग्रीस से बनते हैं साबुन
आपके साबुन का मुख्य इनग्रेडिएंट क्या है ? सोडियम टैलोएट. जिसका मतलब है कि साबुन को एनिमल टैलो (75 से 85 फीसदी) और ऑयल्स से मिलाकर तैयार किया गया है.
प्रॉक्टर एंड गैंबल (पीएंडजी) के प्योर आइवरी साबुन को लीजिए. यह पूरी तरह से एनिमल फैट और थोड़े से वेजिटेबल ऑयल से बना है. साबुन की केमिकल प्रोसेस क्या है? फैट के फैट की कास्टिक सोडा या लाई के साथ रिएक्शन के चलते सोडियम सॉल्ट का ग्लिसरॉल के साथ उत्पादन होता है.
इस केमिकल रिएक्शन को सैपोनीफिकेशन कहा जाता है और सोप इंडस्ट्री कैटल पार्ट्स, व्हेल, सीवीड, एवोकैडो और कोकोनट्स को हासिल करने के लिए कुछ भी कर सकती है. हिटलर के वक्त में यातना शिविरों में मनुष्यों को साबुन में बदला जा रहा था. ज्यादातर अपारदर्शक साबुनों में टैलो होता है.
पियर्स जैसे ट्रांसपेरेंट साबुनों में भी टैलो हो सकता है अगर वे इससे इनकार नहीं कर रहे हों. डव जैसे साबुन पूरी तरह से टैलो होते हैं और साबुनों के त्वचा पर छोड़े जाने वाले ड्राइंग इफेक्ट को घटाने के लिए इनमें ऑयल मिलाया जाता है.
जानवरों के कत्ल पर खड़ा साबुन कारोबार
एनिमल फैट्स साबुन बनाने की प्रक्रिया के लिए अनिवार्य नहीं हैं. फैट कहीं से भी मिल सकता है. लेकिन, इंडस्ट्री मरे हुए जानवरों की ग्रीस का इस्तेमाल करती है क्योंकि यह बेहद सस्ता होता है (क्योंकि हर रोज हजारों जानवरों को कत्ल किया जाता है). इंडस्ट्री का दावा है कि टैलो से बने हुए साबुन हार्ड होते हैं क्योंकि टैलो का बॉइलिंग पॉइंट ऊंचा होता है.
इसकी मुख्य वजह आलस है. पश्चिमी देशों में लंबे वक्त से टैलो का इस्तेमाल हो रहा है और इसी वजह से इसका इस्तेमाल भारत में भी हो रहा है. अगर साबुन खरीदने वाले आधे से ज्यादा लोग शाकाहारी हैं और बकाया लोग अपने शरीरों पर यह एनिमल ग्रीस हर रोज नहीं रगड़ना चाहते हैं तो विज्ञापनों से यह सुनिश्चित होता है उन्हें इस चीज का पता न लगे.
विज्ञापनों से असली साबुन का पता नहीं चलता और आप गलत साबुन खरीद लेते हैं
कोई भी साबुन मैन्युफैक्चरर पैकेट पर इनग्रेडिएंट्स का नाम नहीं देता. इसके बावजूद इसके विकल्प बेहद आसान हैं. साबुनों को वेजिटेबल ऑयल, कोकोनट ऑयल, बादाम के तेल, ऑलिव ऑयल, पाम ऑयल, ग्लिसरीन के साथ फ्लॉवर ऑयल खुशबुओं के साथ तैयार किया जा सकता है और कमर्शियल लाई और थोड़े से बेकिंग सोडा को छोड़कर इसके लिए किसी अन्य चीज की जरूरत नहीं होती.
ये सब चीजें स्किन के लिए भी अच्छी हैं. और टैलो सोप बनाने वाली कंपनियों के विज्ञापनों के उलट ये कहीं ज्यादा प्रभावशाली और कम महंगे हैं. मैं सालों से चंद्रिका का इस्तेमाल कर रही हूं. बिना क्रूरता के सुंदरता वाले इन इंडियन साबुनों की लंबी लिस्ट है.
पीएंडजी की क्रूर और गैरजरूरी गतिविधियां
पीएंडजी इसमें मुख्य दोषी है. 1938 में इन्होंने एक टेक्नोलॉजी तैयार की, जिससे एक जानवर को चंद घंटों में साबुन में तब्दील किया जा सकता था. अब पीएंडजी पूरी दुनिया में खरीदार हासिल करने के लिए कैंपेन चला रही है कि जानवर न केवल उसके साबुनों के लिए जरूरी हैं, बल्कि जानवरों पर साबुनों को टेस्ट करना भी जरूरी है. एनिमल राइट्स ग्रुप्स की रिसर्च के मुताबिक, पीएंडजी प्रोडक्ट टेस्टिंग के लिए हर साल 50,000 से ज्यादा जानवरों की हत्या कर देती है. ये टेस्ट कैसे किए जाते हैं?
साबुन टेस्टिंग के लिए हर साल 50,000 जानवरों की हत्या कर दी जाती है
टेस्ट के नाम पर जानवरों के साथ अत्याचार
टॉक्सिक केमिकल्स कुत्तों को जबरदस्ती खिलाए जाते हैं. इनके मुंह औजारों से जबरदस्ती खोले जाते हैं और इनके वॉयस बॉक्स सर्जरी करके निकाल दिए जाते हैं ताकि ये आवाज न कर पाएं. इन केमिकल्स को खरगोशों की आंखों में भर दिया जाता है और गिनी पिग्स की शेव की गई स्किन पर लगा दिया जाता है. यह सब काम बिना सीडेशन या पेनकिलर्स दिए किया जाता है. अमेरिका में किसी कानून या रेगुलेशन के तहत जानवरों पर साबुनों के टेस्ट की जरूरत नहीं है. पीएंडजी को ऐसा करने में मजा आता है.
तय करें कैसे साबुन का इस्तेमाल करना है
क्या आपका साबुन स्वच्छ है? टेस्टिंग में इतना सारा खून बहाने वाले साबुन और इतने सारे मरे हुए जानवरों का ग्रीस इस्तेमाल कर बनाए गए साबुन से हमारी त्वचा साफ हो सकती है? आप अपना पैसा क्यों साबुनों पर बर्बाद करते हैं- आप क्यों नहीं मीट के टुकड़े अपने फ्रिज में रख लेते और उनसे शरीर को रगड़ते? और याद रखिए मुंहासों पर स्टडीज में ब्लैकहेड्स और टैलो के बीच में एक मजबूत लिंक स्थापित हुआ है.
Via First Post

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